क्या इस बार दिल्ली के छोटे तख्त को मोदी और शाह फतह कर लेंगे ?
क्या इस बार दिल्ली के छोटे तख्त को मोदी और शाह फतह कर लेंगे ?
दिल्ली के सियासी मैदान में सिर्फ आम आदमी पार्टी, भाजपा, कांग्रेस और ओवैसी का ही जिक्र है। दिल्ली के सबसे बड़े तख्त यानी भारत की केन्द्रीय सत्ता पर 2014 से सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए लगातार दिल्ली में छोटे तख्त के लिए हार बहुत बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। इस बार भाजपा के लिए मैदान मारना आसान है, अगर इस बार भी भाजपा दिल्ली में नहीं जीत पाई तो फिर मोदी और शाह की जोड़ी कोई भी चुनाव जीत ले, लेकिन उनके दिल्ली का छोटा तख्त फतह करना नामुमकिन हो जाएगा। भाजपा 1998 से लगातार दिल्ली में विधानसभा चुनाव हार रही है।
यही स्थिति केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के लिए भी है। भ्रष्टाचार हटाओ और अन्ना हजारे आन्दोलन की कोख से पैदा हुई यह पार्टी लगातार 2014 से दिल्ली के छोटे तख्त पर काबिज है। 2015 और 2020 के चुनाव में तो एकतरफा जीत यहां केजरीवाल टीम की हुई थी। इन दोनों चुनावों में भाजपा को यहां नाममात्र की कुछ सीटें मिली थी, वहीं कांग्रेस शून्य पर आउट होकर पवेलियन लौट गई थी। कांग्रेस ने दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में लगातार 15 साल 1998 से 2013 तक शासन किया था तथा इसमें कोई दोराय नहीं है कि शीला दीक्षित ने दिल्ली के विकास में चार चांद लगाए थे।
दिल्ली का धरातल पुकार पुकार कर कह रहा है कि दिल्ली में केजरीवाल टीम कमजोर हुई है, लेकिन स्थिति इतनी कमजोर भी नहीं हुई है कि उसे आसानी से उखाड़ कर फेंक दिया जाए। भाजपा के लिए दिल्ली में मजबूत लीडरशिप का अभाव है, लेकिन सियासी हालात भाजपा के फेवर में बने हुए हैं। कांग्रेस के पास भी लीडरशिप की कमजोरी है, लेकिन नगर निगम चुनाव में उसका वजूद बढ़ा है और इस बार 15-20 सीटों पर उसकी स्थिति मजबूत है तथा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस बार दिल्ली में कुछ सीटें जीत सकती है।
ओवैसी की एआईएमआईएम सिर्फ दो सीटों ओखला और मुस्तफाबाद से चुनाव लड़ रही है, लेकिन ओवैसी की चुनावी ललकार से केजरीवाल टीम खौफ में है। ओवैसी दिल्ली दंगों पर केजरीवाल, कांग्रेस और भाजपा को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, जिसका नुकसान केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को होना तय है।
इसी तरह कांग्रेस ने भी केजरीवाल को जमकर आड़े हाथ ले रखा है, कांग्रेस के उम्मीदवारों को जो वोट मिलेगा उसका बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी से लौटकर वापस आएगा, क्योंकि 2013 के चुनाव में केजरीवाल की जीत और कांग्रेस की बुरी हार इसी कारण हुई थी कि कांग्रेस का वोट केजरीवाल को शिफ्ट हो गया था, इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि वो वोट वापस लौटकर आएगा।
कांग्रेस की स्थिति दिल्ली में इतनी कमजोर नहीं थी, लेकिन बिना धरातल के वे नेता जो राहुल गांधी परिवार के आगे पीछे मंडराते रहते हैं और बंद कमरे में लेपटॉप पर आंकड़ों की बिना सिर पैर वाली रणनीति बनाते रहते हैं, उन्होंने दिल्ली में ही नहीं बल्कि पूरे देश में कांग्रेस को डूबो दिया है। अगर कांग्रेस नेतृत्व ऐसे तथाकथित विद्वानों से मुक्ति पा लेता और समय रहते दिल्ली पर धरातल से जुड़े हुए नेताओं के साथ फोकस करता तो इस बार बाजी पलट सकती थी, जिस मौके को कांग्रेस ने गंवा दिया।
दिल्ली में एक खास बात और है, यहां लोकसभा चुनाव लगातार भाजपा जीत रही है और विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी। विधानसभा चुनाव में भाजपा का सुपड़ा साफ हो रहा है तो लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का। एक कोमन वोटर ऐसा है, जो लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट देता है और विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को वोट देता है। ऐसा देश में दूसरा उदाहरण किसी भी राज्य में नहीं मिलेगा।
यह कोमन वोटर अगर विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिल गया तो फिर केजरीवाल टीम धराशाई हो सकती है, अगर नहीं मिला तो भाजपा नेताओं की सारी चाणक्यगिरी का चौपट होना तय है। इतना भी तय है कांग्रेस को मिलने वाले वोट और दो सीटों पर ओवैसी की ललकार का अप्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिलेगा।

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