बिहार में जनहित तो सिर्फ नारा है, सबको सत्ता की कुर्सी चाहिए
बिहार में जनहित तो सिर्फ नारा है, सबको सत्ता की कुर्सी चाहिए
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और इस सियासी मल्लयुद्ध में सबसे बड़ा मोहरा मुस्लिम वोटर को बना दिया गया है।
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पटना/जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम 14 नवम्बर को आएगा। तब पता चलेगा कि कौन जीता और कौन हारा ? सत्ता बनने के बाद पता चलेगा कि जनहित के मुद्दों की सांकल खाने वाले नेता कितने खरे उतरे ? इस चुनाव में भाजपा, जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस यानी सभी छोटे बड़े दलों और उनके नेताओं ने विकास, जनहित, रोजगार आदि को प्रमुख मुद्दा बना रखा है। लेकिन इन मुद्दों पर कौन कितने खरे उतरे हैं और खरे उतरने की सम्भावना है ? इस सवाल का जवाब ढूंढने की बहुत कम कोशिश हो रही है।
भाजपा, जेडीयू आदि दलों के गठबंधन यानी एनडीए की बिहार में सरकार है और केन्द्र में भी सरकार है। बिहार में नीतीश कुमार लगातार 20 साल से मुख्यमंत्री हैं और कुछ अर्सा छोड़ दें तो वे लगातार भाजपा के सहयोग से ही मुख्यमंत्री रहे हैं। अगर विकास, रोजगार और जनहित के दीगर मुद्दे इनका प्रमुख एजेंडा है, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार सभाओं में कह रहे हैं, तो फिर बिहार का आज यह हाल क्यों है ?
20 साल बहुत होते हैं किसी राज्य की कायापलट करने के लिए। लेकिन यह सच है कि बिहार से हजारों लोग दूसरे राज्यों में रोटी रोजगार के लिए अपना घर-बार छोड़कर जाने को मजबूर हैं। बिहार के लोग बहुत ही संघर्षशील होते हैं और कम कमाई में अपना परिवार चलाकर तरक्की करने का हुनर जानते हैं। लेकिन आज तक सत्ताधीशों ने इनको क्या दिया ? सिर्फ झूठे वादे और थोथी घोषणाएं।
पीएम मोदी को 11 साल हो गए और नीतीश कुमार को 20 साल, फिर बिहार का आज यह हाल ? इससे साबित होता है कि जनहित का काम कम और जबानी जमा-खर्च ज्यादा किया गया। आज जनहित तो सिर्फ एक मुद्दा है, असल मुद्दा सत्ता हासिल करना है। भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है, तो नीतीश कुमार आजीवन मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं, चाहे किसी भी पाले (एनडीए या महागठबंधन) में खड़ा होकर बना जाए।
जहां तक बात आरजेडी और तेजस्वी यादव की है, तो वे भी बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं। उनके पिता जी लालू प्रसाद यादव और माता जी राबड़ी देवी दोनों मुख्यमंत्री रहे हैं, लगातार 15 साल तक तेजस्वी के परिवार का बिहार में राज रहा है, तो फिर बिहार का आज यह हाल क्यों ? ऐसा भी नहीं है कि 1990 से लेकर 2005 तक के इस 15 साल के तेजस्वी परिवार के राज में बिहार में दूध दही की नदियां बहा करती थी, जिन्हें नीतीश कुमार ने सूखा दिया या डकैती डालकर अपनों को मलाई खिला दी।
नीतीश कुमार को बहुत बुरी स्थिति में बिहार मिला था, यह दीवार पर लिखी हुई सच्चाई है और व्यक्तिगत रूप से नीतीश कुमार बहुत ही ईमानदार शख्स हैं, उन्होंने और उनके परिवार ने सत्ता से कोई माल नहीं बनाया है। उन्होंने भाजपा के साथ रहकर और राज चलाकर भी साम्प्रदायिक ताकतों को मजबूत नहीं होने दिया। उन्होंने हर समुदाय का ख्याल भी रखा, जनहित के लिए काम भी किया। लेकिन इतना काम नहीं किया कि बिहार खुशहाल हो जाए। उन्होंने सारा दिमाग मुख्यमंत्री की कुर्सी पर केन्द्रित रखा, कहीं यह छीन न जाए।
जहां तक कांग्रेस की बात है, तो इसके पास सिवाय लफ्फाजी के कुछ नहीं है। 1990 तक बिहार में कांग्रेस का राज रहा है और कैसा रहा है ? सबको मालूम है। बिहार की आज की दुर्दशा के लिए कांग्रेस कोई कम जिम्मेदार नहीं है। अगर कांग्रेस बिहार को बेहतर बनाने की बात कर रही है, तो फिर एक एक सीट के लिए महागठबंधन के दलों के साथ उसने बखेड़ा क्यों खड़ा किया ? जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है या दो तीन साल पहले थी, वहां कांग्रेस ने क्या जनहित के गुल खिलाए हैं और उसके नेताओं ने क्या लूट खसोट की है ? किसी से ढकी छुपी नहीं है।
बिहार चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि सभी जातियों और उनके नेताओं को खुश किया जा रहा है, दोनों गठबंधनों की तरफ से, एक मुस्लिम समुदाय ही ऐसा समुदाय है, जिसे सबने मोहरा बना दिया है। उसके ऊपर लाद दिया है कि तुम तथाकथित सेक्यूलर दलों को ही वोट दो, क्योंकि सेक्यूलरिज्म खतरे में है। मुसलमान के वोट तो नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी सबको चाहिए, लेकिन देने की बात आए तो सभी पिछली कतार में खड़ा कर देते हैं। इस सन्दर्भ में भाजपा की तो बात करना ही बेमानी है, क्योंकि उसकी तो पूरी राजनीतिक इमारत ही ध्रुवीकरण की बुनियाद पर खड़ी है।
(24/10/2025)
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