अन्ता उप चुनाव में वसुंधरा, गहलोत, भजनलाल, जूली और भाया की प्रतिष्ठा दांव पर...
अन्ता उप चुनाव में वसुंधरा, गहलोत, भजनलाल, जूली और भाया की प्रतिष्ठा दांव पर...
----------------------------------
इस उप चुनाव में कौन किसकी नय्या डुबाएगा ? कौन वोट काटू बनकर किसकी नय्या बचाएगा ? और कौन अन्दरखाने का सियासी खेल खेलकर किसको पछाड़ेगा ?
----------------------------------
जयपुर/अन्ता (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। साल भर पहले राजस्थान में हुए एक साथ 7 विधानसभा सीटों पर उप चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा ने प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस और स्थानीय ताकतों को धूल चटाकर 5 सीटें जीती थी, इनमें 3 सीटें उन्होंने कांग्रेस से छीनी और एक हनुमान बेनीवाल से। तब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और प्रदेश भाजपा दोनों के नम्बर दिल्ली दरबार में बढ़ गए थे। उस उप चुनाव में कांग्रेस के बहुत से नेताओं ने भाजपा उम्मीदवारों का अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया था। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके चेलों ने पर्दे के पीछे पूरी ताकत लगाई थी भाजपा उम्मीदवारों को हराने की।
खैर, यह बात एक साल पुरानी हो गई। अब अन्ता सीट पर 11 नवम्बर को उप चुनाव है तथा अन्ता विधानसभा सीट झालवाड़-बारां लोकसभा क्षेत्र में आती है, जहां से भाजपा से दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह लगातार पांचवीं बार सांसद हैं। यह वसुंधरा राजे का गढ़ है, इसलिए वसुंधरा राजे की प्रतिष्ठा इस चुनाव में पूरी तरह से दांव पर लग चुकी है।
भाजपा ने अपना उम्मीदवार मोरपाल सुमन को बनाया है, जो वसुंधरा राजे के नजदीकी कार्यकर्ता और जमीन से जुड़े हुए शख्स हैं। वर्तमान में वे बारां पंचायत समिति के प्रधान भी हैं। यानी भाजपा ने एक तरह से मोरपाल सुमन को जिताने की जिम्मेदारी वसुंधरा राजे और उनके सांसद पुत्र के कांधे पर डाल दी है। बताया यह जा रहा है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने टिकट से पहले वसुंधरा राजे के घर जाकर उनसे मुलाकात की तथा वसुंधरा राजे की इच्छा के अनुसार उनके नजदीकी कार्यकर्ता को टिकट दे दिया।
इसलिए अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से ज्यादा जिम्मेदारी मोरपाल सुमन को जिताने की वसुंधरा राजे की हो गई है। हालांकि मोरपाल सुमन की हार जीत से भाजपा सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बहुमत पहले ही काफी ज्यादा है। लेकिन यह सीट भाजपा के पास थी और वहां के विधायक कंवरलाल मीणा को एक मुकदमे में हुई सजा के कारण खाली हुई है। इसलिए इसे भाजपा के लिए जितना बहुत ही आवश्यक है। वैसे अमूमन उप चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की ही जीत होती है, लेकिन चुनावी चौसर को देखकर लग रहा है कि भाजपा के लिए अन्ता का गढ़ बचाना इतना आसान नहीं है, बहुत जोर लगाना पड़ेगा।
अगर भाजपा यह सीट हार जाती है, तो वसुंधरा राजे की लीडरशिप पर सवाल उठेगा कि वे अपने इलाके में अपने चहेते उम्मीदवार को भी चुनाव नहीं जीता पाईं। इसी तरह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पर भी सवाल उठेगा कि सत्ता में होते हुए वे भाजपा की खाली सीट को ही नहीं जीत सके। हालांकि भजनलाल शर्मा के पास कहने को है कि हमने तो वसुंधरा जी के हवाले यह सीट कर दी थी। अगर भाजपा यह सीट जीत जाती है, तो फिर वसुंधरा राजे और भजनलाल शर्मा दोनों के नम्बर पार्टी नेतृत्व के सामने बढ़ जाएंगे।
अब सिक्के का दूसरा रूख कांग्रेस, गहलोत, डोटासरा, टीका राम जूली और सचिन पायलट की तरफ। कांग्रेस ने यहां से तीन बार विधायक रहे और दो बार कद्दावर मंत्री रहे प्रमोद जैन भाया को एक बार फिर मैदान में उतारा है। भाया की क्षेत्र में जबरदस्त पकड़ है, लेकिन कांग्रेस के बागी नरेश मीणा ने चुनावी चौसर को बदल दिया है। सालभर पहले हुए देवली-उनियारा विधानसभा उप चुनाव में उन्होंने बागी होकर चुनाव लड़ा, 60 हजार वोटों के साथ दूसरे नम्बर पर रहे, तब उन्होंने यहां कांग्रेस की जमानत जब्त करवा दी थी।
इस चुनाव में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कोई बड़ा लेना-देना नहीं है, उनके नम्बर न घटेंगे और ना ही बढ़ेंगे, क्योंकि उन्हें पीसीसी अध्यक्ष पद से हटाने की तैयारी पहले ही शुरू हो चुकी है। सचिन पायलट अगर गुर्जर वोट अच्छे खासे भाया को दिलाने में सफल नहीं रहे, तो फिर यह माना जाएगा कि उन्होंने गहलोत गुट के भाया को चुनाव जीताने में बड़ी मदद नहीं की या गुर्जर वोटर पर पायलट की पकड़ कमजोर हो चुकी है।
टीका राम जूली जो कि नेता प्रतिपक्ष हैं और अनुसूचित जाति से सम्बन्धित नेता हैं। अन्ता एससी बाहुल्य सीट है और भाजपा के पूर्व विधायक रामपाल मेघवाल जो कि एससी समुदाय से हैं, बागी होकर मैदान में उतर चुके हैं। एससी वोटर कांग्रेस व भाया का परम्परागत वोट माना जाता है। अगर रामपाल मेघवाल की वजह से भाया चुनाव में पटखनी खा गए, तो यह संदेश साफ जाएगा कि टीकाराम जूली भाया को एससी वोट नहीं दिलवा पाए।
अब बात अशोक गहलोत की, जो माली समुदाय से सम्बन्धित नेता हैं और अन्ता एक माली बाहुल्य सीट है तथा भाजपा उम्मीदवार मोरपाल सुमन भी माली समुदाय से हैं। ऐसे में तीन बार के मुख्यमंत्री रहे गहलोत की प्रतिष्ठा पूरी तरह दांव पर लग चुकी है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रमोद जैन भाया गहलोत गुट के नेता हैं। ऐसे में गहलोत के लिए जरूरी हो गया है कि वे माली समुदाय के अच्छे खासे वोट भाया को दिलाकर उन्हें चुनाव जिताएं।
अगर भाया चुनाव हार जाता है और गहलोत 10-12 हजार माली वोट भी भाया को नहीं दिलवा पाते हैं, तो फिर गहलोत की लीडरशिप पर सवाल खड़ा होगा कि वे कैसे नेता हैं अपने समुदाय के वोट भी अपने चेले को नहीं दिलवा पाए ? भाया के लिए यह चुनाव जीतना इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है कि वे बारां जिले में कांग्रेस का बड़ा चेहरा हैं, परिस्थितियां विपरीत हैं, इसलिए अगर वे कैसे भी करके चुनाव जीत जाते हैं, तो इसकी गूंज अन्ता से जयपुर और दिल्ली तक होगी। अगर भाया चुनाव हार जाते हैं तो फिर उनके कद्दावर सियासतदां होने और सभी समुदायों में पकड़ होने की ताकत की हवा निकल जाएगी।
अब बात नरेश मीणा और मोरपाल सुमन की। नरेश एक कद्दावर युवा नेता हैं, उन्होंने दो साल में तीन विधानसभा क्षेत्रों छबड़ा, देवली-उनियारा और अन्ता से निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़कर अपने आपको साबित किया है कि वे एक जुझारू और ऊर्जावान नेता हैं। अगर नरेश मीणा चुनाव जीत जाते हैं तो यह उनकी जीत से ज्यादा कांग्रेस, भाजपा, अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे, भजनलाल शर्मा और प्रमोद जैन भाया की करारी हार होगी। साथ ही राजस्थान विधानसभा में जनहित के मुद्दों पर संघर्ष करने वाला एक निर्दलीय युवा विधायक पहुंच जाएगा।
जहां तक बात मोरपाल सुमन की है, तो उनकी छवि क्षेत्र में बहुत ही अच्छी है। वे एक गरीब परिवार से यहां तक पहुंचे हैं, वे एक किसान के बेटे हैं और उन्होंने खुद ने भी खेती की है। उनकी पहचान क्षेत्र में एक शरीफ चेहरे के तौर पर है। इस इलाके में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी अच्छी खासी पकड़ है।
मोरपाल दोनों ही संगठनों से जुड़े हुए हैं। इसलिए मोरपाल के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बन्धित सभी संगठन जोर लगाएंगे और वसुंधरा राजे की ताकत तो उनके साथ है ही, ऐसे में उनकी जीत होती है, तो यह जमीन से जुड़े हुए एक कार्यकर्ता की जीत मानी जाएगी, जिससे अन्य कार्यकर्ताओं में भी उम्मीद जगेगी। अगर मोरपाल चुनाव हार जाते हैं तो यह उनकी नहीं बल्कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वसुंधरा राजे की हार मानी जाएगी।
देखना यह है कि इस त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय चुनाव में कौन बाजी मारता है और किसकी प्रतिष्ठा बचती है या किसकी प्रतिष्ठा धूमिल होती है ? कौन वोट काटू साबित होता है और कौन वोट काटकर किसको लाभ व हानि पहुंचाता है ? इन सभी सवालों के जवाब मतगणना के दिन 14 नवम्बर को मिल जाएंगे। देखते रहिए पढ़ते रहिए "थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका।"
(24/10/2025)
--------------------------------------
➡️अगर आपको हमारा यह लेख/खबर पसंद आया हो, तो प्लीज इसे शेयर/फॉरवर्ड कीजिए और साथ ही हमारे अखबार की आर्थिक मदद भी कीजिए।अकाउंट डिटेल्स:- इकरा पत्रिकाA/c no. 613900 55000 00252IKRA PATRIKAIFSC:- PUNB 0613900PNB, MUSLIM SR. SEC. SCHOOL, MOTI DUNGARI ROAD, JAIPUR.
--------------------------------------
➡️इकरा पत्रिका को सहयोग राशि आप Paytm, Phone Pay और Google Pay से भी भेज सकते हैं। फोन नम्बर 9414361522 पर (अकाउंट Farooq Ali Khan)
--------------------------------------
-©️ Copyright :- इस सम्पूर्ण लेख/खबर को या इसके किसी पैराग्राफ़ को हुबहू या तोड़ मरोड़ कर प्रकाशित करना मना है। अलबत्ता आप चाहें तो लेखक और हमारे अखबार के नाम के साथ इस सम्पूर्ण लेख/खबर को सोशल मीडिया पर शेयर जरूर कर सकते हैं।
------------------------------------
-@-फारूक़ अली ख़ान सम्पादक
थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका।
09602992087, 09414361522
©️ Copyright Thar News & Ikra Patrika. All Rights Reserved.

Comments
Post a Comment