बिहार चुनाव के बाद क्या होगा मोदी और राहुल का

बिहार चुनाव के बाद क्या होगा मोदी और राहुल का ?

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। बिहार विधानसभा चुनाव देश में एक बड़ा बदलाव लाएगा। यह चुनाव न सिर्फ बिहार का हो रहा है बल्कि एक तरह से पूरे देश का हो रहा है, पूरा देश बिहार चुनाव पर नजर गड़ाए हुए है। इस चुनाव के बाद तमाम सियासी समीकरण बदल जाएंगे, किसी की कुर्सी हिलने लगेगी, तो किसी को कुर्सी मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी। बिहार ने पहले भी देश में सत्ता और राजनीतिक परिवर्तन का इतिहास रचा है और इस बार भी यह इतिहास रचा जाना तय है।



यह बदलाव राजनीतिक दलों, नेताओं और गठबंधनों में भी होगा। 14 नवम्बर को मतगणना के दिन क‌ई बड़े राजनेताओं का सियासी भविष्य भी तय हो जाएगा। यह चुनाव एक ऐसा चुनाव होगा, जिसके परिणाम से कुछ को सियासी जीवनदान मिल जाएगा, तो कुछ की सत्ता बच जाएगी, तो कुछ की सत्ता में वापसी हो जाएगी, तो कुछ के सपने चकनाचूर हो जाएंगे।


इस चुनाव में दोनों प्रमुख गठबंधनों एनडीए और इंडिया ने करो मरो वाला जोर लगा रखा है, तो गठबंधनों से बाहर वाली छोटी मोटी पार्टियों ने खेल बनाने और बिगाड़ने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है। इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव आदि का जहां सब कुछ दांव पर लगा हुआ है, वहीं यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सियासी भविष्य भी तय होना है।


सबसे पहले बात तेजस्वी यादव की, अगर वो अपने गठबंधन को चुनाव जीताकर मुख्यमंत्री बन जाते हैं, तो उनके लिए छोटी सी उम्र में यह बहुत बड़ी सफलता होगी, अगर नहीं बन पाते हैं तो युवा व जुझारू हैं, उनके भविष्य को कोई बड़ा नुक़सान नहीं होना है। अब बात करें राहुल गांधी की, अगर महागठबंधन-इंडिया गठबंधन चुनाव हार गया तो इसका ठीकरा उनके व उनके नेताओं के सिर फोड़ा जाएगा, पिछली बार की तरह तथा इंडिया गठबंधन कमजोर हो जाएगा और राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल खड़े होंगे।


बात प्रधानमंत्री मोदी की, तो बिहार चुनाव जीतना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उनके लिए है। अगर बिहार चुनाव एनडीए हार गया, तो फिर मोदी और अमित शाह दोनों के खिलाफ भाजपा के अंदर माहौल तेजी से गोलबंद होगा। मोदी को हटाने के लिए 75 साल पार की उम्र और बिहार विफलता का मुद्दा जोर पकड़ेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस मौके पर चुकेगा नहीं और वो मोदी को सत्ता से बेदखल करने का प्रयास करेगा। एनडीए की यह हार यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को तेजी से दिल्ली की तरफ (प्रधानमंत्री पद के लिए) बढ़ाएगी।


अब तस्वीर का दूसरा रूख, अगर एनडीए जीत गया, मुख्यमंत्री भाजपा का बन गया, तो फिर पासा पलट जाएगा। मोदी और शाह की जोड़ी और मजबूत हो जाएगी तथा फिर योगी आदित्यनाथ की विदाई समारोह का दिन दिनांक तय करने का सियासी मुहुर्त देखना शुरू हो जाएगा। यह तय मानिए कि बिहार जीतने के बाद मोदी-शाह की जोड़ी का प्रमुख लक्ष्य योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाना होगा तथा वो इसमें सफल भी हो जाएंगे।


अब बात नीतीश कुमार की, एनडीए जीता और भाजपा की सीटें 60 के आस-पास अटक गईं, तो फिर उम्र के इस पड़ाव में वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगे, चाहे उनका स्वास्थ्य कैसा भी हो। अगर भाजपा की सीटें अच्छी खासी आ गई, तो नीतीश कुमार की सम्मानपूर्वक विदाई हो जाएगी। लेकिन चुनावी मैदान की खबरें बता रही हैं कि नीतीश कुमार का ग्राफ पिछले दो हफ्ते में तेजी से बढ़ा है।


महागठबंधन और एनडीए दोनों में पार्टियां और नेता एक दूसरे के साथ सेंधमारी कर रहे हैं। साथ ही दोनों ही गठबंधन एक दूसरे के खिलाफ छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस खेल से परिणाम का सिक्का किधर भी पलट सकता है। हार जीत किसी को भी स्पष्ट नजर नहीं आ रही है। लेकिन इतना तय है कि महागठबंधन की सरकार तभी बनेगी या टिकी रहेगी, जब वो 140 के आस पास सीटें लेकर आए। अगर महागठबंधन को मामूली बहुमत मिला तो अव्वल तो उसकी सरकार बनने नहीं दी जाएगी, अगर बन भी गई तो छह महीने में गिरा दी जाएगी।


एनडीए 115 के आस पास भी रहा तो कैसे भी करके अपनी सरकार बना लेगा और यह निश्चित है कि यह सरकार नीतीश कुमार के ही नेतृत्व में बनेगी, क्योंकि भाजपा के पास और कोई रास्ता नहीं बचेगा। मोदी और शाह कैसे भी करके एनडीए की सरकार बनवाएंगे, अगर इस काम में वे विफल हो ग‌ए या उन्होंने नीतीश कुमार के साथ कोई चाल चली तो नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव वापस हाथ मिला लेंगे तथा यह खेल मोदी सरकार को गिरा भी सकता है, क्योंकि सबको पता है कि मोदी सरकार नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू की बैसाखी पर टिकी हुई है।


अगर महागठबंधन हारा और उसमें कांग्रेस की कारस्तानी नजर आई, तो फिर समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियां अपने स्तर पर गोलबंद होंगी तथा राहुल गांधी की सियासत से साथी दलों व नेताओं का भरोसा उठ जाएगा। इस समीकरण में विपक्षी गठबंधन का बड़ा चेहरा अखिलेश यादव बन सकते हैं, जो साल भर बाद होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में बिहार में हुई गलती को नहीं दोहराना चाहेंगे। इसलिए यह तय है कि बिहार चुनाव के परिणाम बहुत बड़ा बदलाव लाने वाले हैं।

(09/11/2025)

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