डोटासरा जी चौमूं प्रकरण की जांच रिपोर्ट कब सार्वजनिक करोगे ?

डोटासरा जी चौमूं प्रकरण की जांच रिपोर्ट कब सार्वजनिक करोगे ?

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चौमूं/जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। चौमूं में दिसम्बर 2025 के आखरी सप्ताह में कलन्दरी मस्जिद अतिक्रमण को लेकर फसाद हुआ, पुलिस और विरोध करने वालों के बीच झड़प हुई, पुलिसकर्मी और कुछ लोग घायल हुए। इस प्रकरण पर जांच के लिए कांग्रेस ने दो कमेटियां गठित की। लेकिन आज तक वो जांच रिपोर्ट कहां है और कब सार्वजनिक होगी ? किसी के पास कोई जवाब नहीं है।



राजस्थान में पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा हैं, उन्हीं ने यह कमेटी गठित की थी। अब सवाल यह है कि डोटासरा जी हर मुद्दे पर बोलते हैं, बोलते कम हैं और एक्टिंग ज्यादा करते हैं, तो डोटासरा जी चौमूं प्रकरण की जांच रिपोर्ट कब सार्वजनिक करोगे या उसे सिर्फ एक लोलीपॉप की तरह पीड़ित लोगों को थमा दी थी कि बेटा इसे चूसते रहो, आपकी पीड़ा स्वत ही समाप्त हो जाएगी ?


पूरे प्रकरण को आगे विस्तार से पढ़िए, पहले इन दो कमेटियों की बात करते हैं। पीसीसी अध्यक्ष डोटासरा और कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग प्रदेशाध्यक्ष एम डी चौपदार ने इस प्रकरण पर दो अलग-अलग जांच कमेटियां 4 जनवरी को गठित की। इसकी सूचना डोटासरा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर नहीं डाली और ना ही कोई प्रेस नोट जारी किया। यह सूचना एम डी चौपदार ने अपने फेसबुक पेज पर डाली। खबर है कि यह कमेटियां एम डी चौपदार के आग्रह पर ही डोटासरा ने गठित की थी।



कांग्रेस की जांच कमेटी का अध्यक्ष फुलेरा विधायक विद्याधर चौधरी को बनाया गया। यह जांच कमेटी एक तरह की रस्म अदायगी करने के लिए इस प्रकरण के 13वें दिन यानी 7 जनवरी को मौका मुआयना करने चौमूं पहुंची। कमेटी भी इसलिए गठित हुई कि "थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका" ने इस मुद्दे को लगातार कवर किया और कांग्रेस के रवैए पर सवाल खड़े किए, तब जाकर यह कमेटियां गठित की गई।


खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। जांच के दौरान चौमूं में मीडिया से बात करते हुए कमेटी अध्यक्ष विद्याधर चौधरी, सदस्य धर्मेन्द्र राठौड़ और चौमूं से कांग्रेस विधायक व इस कमेटी की सदस्य डॉक्टर शिखा मील बराला ने कहा कि जांच रिपोर्ट तैयार कर इसे कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा को सौंपा जाएगा। वही इसे सार्वजनिक करेंगे।


अब पहले पूरा प्रकरण पढ़िए। राजस्थान की राजधानी जयपुर से 20-25 किलोमीटर दूर एक कस्बा, नाम चौमूं। जो अपनी गंगा जमुनी तहज़ीब (मिले-जुले कल्चर) के लिए मशहूर है। यहां पठान मोहल्ला और इमाम चौक नाम से मशहूर इलाका है, यहां जो पठान आबाद हैं, उन्हें तत्कालीन जयपुर रियासत के राजा साहब ने रियासत की सुरक्षा व कानून व्यवस्था के लिए आबाद किया था।


इस कस्बे के बस स्टैंड के पास एक मस्जिद है, जो कलन्दरी मस्जिद के नाम से जानी जाती है। इसके अतिक्रमण हटाने और रेलिंग लगाने और फिर रेलिंग उखाड़ने के मुद्दे पर यहां फसाद हुआ। यह फसाद साम्प्रदायिक नहीं बल्कि पुलिस और विरोध प्रदर्शन करने वालों के बीच हुआ। जिसमें पुलिसकर्मियों सहित दर्जनभर लोग घायल हुए। इंटरनेट बन्द करना पड़ा और पूरे कस्बे में अतिरिक्त पुलिस फोर्स और अधिकारियों की तैनाती की गई।


यह मामला है 26 दिसम्बर 2025 सुबह तीन चार बजे का, यानी रात का। खबर है कि पहले दिन 25 दिसम्बर को पुलिस प्रशासन और मस्जिद कमेटी के बीच कोई सहमति बनी थी, जो क‌ई बार की चर्चा के बाद तय हुई थी। इस सहमति के तहत मस्जिद के आगे जो पत्थर पड़े थे, उन्हें हटाकर रेलिंग लगानी थी, जिससे यातायात सुचारू रूप से संचालित हो सके और यहां हादसे नहीं हों। यह पुलिस प्रशासन और मस्जिद कमेटी का बहुत ही सराहनीय कदम था।


खबर है कि इस सहमति के तहत 25 दिसम्बर को पत्थर हटा दिए गए और रेलिंग लगानी शुरू कर दी गई। लेकिन शाम को राजनीतिक दबाव बनाया गया, जिससे पुलिस प्रशासन ने रेलिंग उखाड़ना शुरू कर दिया। इस बात को लेकर पुलिस और स्थानीय लोगों में विवाद बढ़ गया, जिसमें जमकर पथराव हुआ और लोग घायल हुए। इस प्रकरण में 100 से अधिक लोगों की धर-पकड़ की गई, जिनमें से करीब डेढ़ दर्जन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार किया गया। इन सबकी जमानत पिछले दिनों हो चुकी है।


यहां उल्लेखनीय यह भी है कि इस मस्जिद को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में मुकदमा चल रहा है और मामले में हाईकोर्ट का स्टे भी है। विवाद करीब 45 साल पुराना बताया जाता है। अब सवाल यह है कि जब हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर है, तो फिर पुलिस प्रशासन और मस्जिद कमेटी ने सहमति के नाम पर स्टे ऑर्डर का उल्लंघन क्यों किया ?


अगला सवाल यह है कि जनहित के लिए पुलिस प्रशासन और मस्जिद कमेटी ने कोई फैसला लिया और अतिक्रमण हटाकर रेलिंग लगाई, तो फिर वे कौन राजनेता और पुलिस प्रशासन के उच्चाधिकारी हैं, जिन्होंने स्थानीय अधिकारियों पर दबाव बनाकर रात को रेलिंग हटाने का काम करवा कर फसाद का बीज बोया ? इस मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो, सबके चेहरे उजागर हों। क्योंकि प्रकरण में माननीय हाईकोर्ट का स्टे है, तो इस पूरे घटनाक्रम की जांच हाईकोर्ट को अपनी निगरानी में करानी चाहिए।


इस प्रकरण पर तब सियासी गलियारों में एक तरह की खामोशी छाई रही, भाजपा व कांग्रेस की तरफ से कोई बड़ी बयानबाजी नहीं हुई। सिर्फ चौमूं से तीन बार भाजपा विधायक रहे रामलाल शर्मा और पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का बयान सबसे पहले आए। डोटासरा ने स्थानीय थानाधिकारी और रामलाल शर्मा को इस मुद्दे से जोड़ा और थानाधिकारी पर चौमूं से सियासी सपने देखने के आरोप लगाए, यानी थानाधिकारी यहां से भविष्य में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं और रामलाल शर्मा उस तैयारी को पसंद नहीं कर रहे हैं।


पूरे प्रकरण को देखने व सुनने के बाद यह तो जाहिर हो रहा है कि यह कुछ सियासी मामला जरूर है, लेकिन थानाधिकारी पर बहुत से लोगों का भरोसा भी था, लोग यह भी कहते हैं कि तत्कालीन सीआई साहब ने काफी विस्तृत चर्चा और सबको राजी करके यह सहमति बनाई थी, ताकि बस स्टैंड पर राहगीर परेशान नहीं हों और इन पत्थरों की वजह से हादसे नहीं हों। इससे यह भी साबित होता कि थानाधिकारी के इस अच्छे प्रयास पर किसी राजनेता या उच्चाधिकारी ने पानी जरूर फेरा है, जिसके परिणामस्वरूप यह फसाद हुआ। इस प्रकरण में असली दोषियों के चेहरे तभी सामने आएंगे, जब इसकी हाईकोर्ट की निगरानी में माननीय हाईकोर्ट जांच करवाए।


सियासी खामोशी और पुलिस प्रशासन के फेलियर पर इस प्रकरण पर "थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका" ने लगातार कवरेज की। विपक्ष की भूमिका और खामोशी पर सवाल खड़े किए, तब 4 जनवरी को पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने एक जांच कमेटी गठित की। इससे पहले 2 जनवरी को इस पत्थरबाजी के आरोपियों के दुकान, मकान व गलियों में बुलडोजर चलाकर प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की। स्थानीय लोगों ने पुलिस प्रशासन पर निर्दोष लोगों की धर-पकड़ और उनके घर मकानों में तोड़ फोड़ और महिलाओं से अभद्रता के आरोप भी लगाए थे।


एक महीने के करीब होने के बाद भी कांग्रेस ने अपनी दोनों जांच कमेटियों की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की, तो इस मुद्दे को "थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका" ने फिर उठाया। इसके बाद 30 जनवरी को एम डी चौपदार ने एक फाइल जांच रिपोर्ट के तौर पर डोटासरा को सौंपी और इसकी सूचना सोशल मीडिया पर उन्होंने डाली। यह सूचना भी डोटासरा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर नहीं डाली।


एम डी चौपदार के अल्पसंख्यक विभाग की जांच रिपोर्ट का क्या हुआ ? किसी को कोई पता नहीं है। कम से कम वे अपने विभाग की जांच रिपोर्ट तो सार्वजनिक कर ही सकते थे ? चौपदार खुद पीसीसी की जांच कमेटी के भी सदस्य थे, उन्होंने जब यह रिपोर्ट डोटासरा को सौंपी तो कमेटी अध्यक्ष विद्याधर चौधरी, सदस्य धर्मेन्द्र राठौड़ और चौमूं से कांग्रेस विधायक व इस कमेटी की सदस्य डॉक्टर शिखा मील बराला वहां मौजूद नहीं थे, हो सकता है कि वे जयपुर से बाहर हों या उनको बताए बगैर ही यह रिपोर्ट सौंप दी गई हो ?


विचित्र बात यह भी है कि डोटासरा लक्ष्मणगढ़ (सीकर) से विधायक हैं और जयपुर से लक्ष्मणगढ़ आते जाते रहते हैं, इसी सीकर हाईवे पर यह चौमूं कस्बा है, लेकिन डोटासरा ने अपनी गाड़ी के चौमूं में एक बार भी ब्रेक नहीं लगवाए, ताकि वे वहां जाकर मामले की जानकारी लें और पीड़ितों से मिलें। 


डोटासरा जिस पीसीसी मुख्यालय में बैठते हैं, वहां से चौमूं के इस पठान मोहल्ले व इमाम चौक की दूरी मात्र 30 किलोमीटर है। खास बात यह भी है कि डोटासरा की सीट पर 40 हजार से अधिक मुस्लिम वोटर हैं, जो एक तरह से एकतरफा डोटासरा को मिलते हैं, इसीलिए वे लगातार चार बार विधायक बने हैं। इसके बावजूद डोटासरा ने चौमूं में पीड़ितों के बीच जाकर खड़ा होना भी मुनासिब नहीं समझा।


हो सकता है कि डोटासरा की कोई सियासी मजबूरी हो या उन्हें चौमूं की इस पीड़ा को जानने की फुर्सत ही नहीं मिली, क्योंकि वे प्रदेशाध्यक्ष हैं, इतना बड़ा राज्य है, इतनी बड़ी पार्टी को संचालित कर रहे हैं, तो ऐसे छोटे मोटे प्रकरण को जानने के लिए फुर्सत कहां मिले ?  


खैर, उम्मीद पर दुनिया कायम है। यह लेख पढ़ने के बाद उम्मीद है कि डोटासरा जी चौमूं प्रकरण को जानने के लिए चौमूं का दौरा भी करेंगे और कांग्रेस की जांच रिपोर्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सार्वजनिक करेंगे तथा उन्होंने पूर्व में तत्कालीन थानाधिकारी और पूर्व विधायक रामलाल शर्मा पर जो राजनीतिक आरोप लगाया था, उसके बारे में पूरा खुलासा भी करेंगे ?

(09/02/2026)

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-@-फारूक़ अली ख़ान सम्पादक

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