जयपुर में सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद ढहाई ग‌ई या इसके पीछे कुछ और...?

जयपुर में सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद ढहाई ग‌ई या इसके पीछे कुछ और...?

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शायद यह राजस्थान का पहला वाकिया है, जिसमें जेडीए प्रशासन ने हठधर्मिता और गैर कानूनी प्रक्रिया का पालन किया।

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राजस्थान वक्फ बोर्ड की घोर लापरवाही रही या मिलीभगत, जिसका जवाब वक्फ बोर्ड चेयरमैन, सीईओ और मेम्बर्स को कटघरे में खड़ा कर रहा है।

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मुस्लिम विधायक जिस दिन नोटिस मिला उस दिन पार्टी कर रहे थे, अगर वे तुरंत मुख्यमंत्री से मिलते तो शायद रिलीफ़ मिल सकती थी।

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प्रकरण पर गहलोत, डोटासरा, जूली, पायलट आदि बड़े कांग्रेसी नेताओं की खामोशी बताती है कि इन लोगों को इस मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है।

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है कि सड़क चौड़ीकरण के नाम पर 45 साल पुरानी पूरी मस्जिद को चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था और नेटबंदी के बीच ढहा दिया गया। अगर यह मामला सिर्फ सड़क चौड़ीकरण का है, तो ग़लत नहीं है। लेकिन इसके पीछे कोई और खेल है तो बहुत ग़लत है और ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्योंकि इससे शासन-प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी पर सवाल खड़े होते हैं।



प्रकरण 8 जून 2026 का है, पूरे देश में टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर यह मामला छाया रहा। जयपुर के मालवीय नगर इलाके में नूरानी नाम से एक मस्जिद थी, जिसके प्रबंधकों के मुताबिक यह मस्जिद खरीदी हुई जमीन पर सम्पूर्ण कानूनी प्रक्रिया के तहत 1981 में निर्मित की गई थी, जिसका नियमानुसार 1988 में राजस्थान वक्फ बोर्ड जयपुर में रजिस्ट्रेशन हुआ था, यह एक वक्फ जायदाद है, जहां पांचों वक्त की नमाज पाबंदी से पढ़ी जाती थी।


मस्जिद प्रबंधकों के अनुसार भारत सरकार के वक्फ अधिनियम के तहत 28 अप्रैल 1988 को रजिस्ट्रेशन नम्बर 5235 पर राजस्थान वक्फ बोर्ड में इस मस्जिद को रजिस्टर्ड कराया था। तब यहां 30 फीट की सड़क प्रस्तावित थी। 29 जून 1994 को जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (जेडीए) की रसीद संख्या 86925 विकास शुल्क 9775 रूपए और अन्य शुल्क 1955 रूपए यानी कुल 9971 रूपए इस भूखंड के नियमन हेतु जमा कराए थे। यह विवरण मस्जिद प्रबंधन कमेटी ने जेडीए को जो जवाब दिया उसमें भी मौजूद है।



जेडीए ने 5 जून शुक्रवार रात 8 बजे मस्जिद कमेटी को नोटिस दिया, जिसमें तीन दिन की मोहलत दी गई और इस मस्जिद को अतिक्रमण बताकर हटाने की बात कही। अब यह तीन दिन कैसे ? 5 जून को तब तक सभी दफ्तर और अदालतें बंद हो गई, 6 को शनिवार और 7 को रविवार होने के कारण दो दिन की सरकारी छुट्टी रही, 8 जून की सुबह मस्जिद ढहाने की कार्रवाई शुरू कर दी गई। यह जेडीए की गैर कानूनी, असंवैधानिक और प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत) को ताक में रखने की कार्रवाई नहीं थी, तो फिर क्या थी ?


प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत) क्या है ? यह सिद्धांत कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की आत्मा है। इसका उद्देश्य निष्पक्षता सुनिश्चित करना है, मनमानी कार्रवाई रोकना है और आम जनता का न्याय प्रणाली पर विश्वास बनाए रखना है। भारतीय संविधान में इसे अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता) का संरक्षण प्राप्त है। 



प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस केवल अदालतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सभी प्रशासनिक, अर्ध-न्यायिक निकायों और सभी संस्थाओं पर भी समान रूप से लागू होता है। यह सिद्धांत इस बात की गारंटी देता है कि न्याय न सिर्फ होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। किसी भी व्यक्ति को कोई सजा देने या उसके अधिकारों को प्रभावित करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए। इस सिद्धांत के तहत किसी भी व्यक्ति को आरोपों की पूर्व सूचना देना और उसे अपना बचाव करने एवं सबूत पेश करने का पर्याप्त मौका देना चाहिए।


क्या उक्त मस्जिद को ढहाने में जेडीए ने प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस का अवसर दिया ? जवाब है नहीं। जेडीए शनिवार और रविवार के अवकाश के अवसर पर शुक्रवार को अवकाश होने के बाद रात को नोटिस देता है, तब पीड़ित पक्ष न्याय के लिए किस न्यायालय और सरकारी दफ्तर का दरवाजा खटखटाएगा ? जेडीए को सोमवार या मंगलवार को नोटिस देना चाहिए था, ताकि पीड़ित पक्ष को नहीं लगता कि उसके साथ अन्याय हुआ है तथा उसे अपना पक्ष रखने और न्याय प्राप्त करने का पूरा अवसर मिलता।


बड़े-बड़े आईएएस और आर‌एएस अधिकारी जेडीए में बैठे हैं, क्या उन्हें प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस का ज्ञान नहीं है ? बिल्कुल है और उन्होंने छुट्टी का दिन जानबूझकर चुना है। क्या जेडीए के अधिकारियों की इतनी हिम्मत है कि वे जयपुर में बड़ी चौपड़ से चांदपोल तक करीब डेढ़ किलोमीटर की सड़क पर मौजूद आधा दर्जन मंदिरों तथा शहर में मौजूद धन्ना सेठों और राजनेताओं के अवैध निर्माण छुट्टी के दिन का अवसर उठा कर उनके बुलडोजर लगा दें ?


अब बात सेक्टर रोड या मास्टर प्लान की। जेडीए को यह अधिकार है कि वो जनहित के लिए सड़कें चौड़ी करे, इसके लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए कार्रवाई करे। लोगों को भरोसे में ले, उन्हें उचित मुआवजा या बदले में भूमि दिलवाए। सड़क चौड़ीकरण और अतिक्रमण हटाने में पूरी पारदर्शिता और समानता बरती जाए। जयपुर में क‌ई सेक्टर रोड और मैन रोड अतिक्रमण का शिकार हैं, जयपुर में असंख्य रसूखदारों के भवन, फार्म हाउस, संस्थान आदि सड़क सीमा में हैं या उनका कुछ हिस्सा सरकारी भूमि में निर्मित है, जेडीए उन सब पर बुलडोजर कब चलाएगा ?


एक और मुद्दा जिसका उल्लेख करना यहां आवश्यक है कि जयपुर की सिरसी रोड और कालवाड़ रोड झोटवाड़ा, जो शहर की मुख्य सड़कें हैं, दोनों पर सालभर पहले जेडीए ने सड़क चौड़ीकरण के लिए तोड़-फोड़ की, अतिक्रमण हटाया, लेकिन दोनों सड़कों पर आज भी मंदिर नहीं हटाए गए हैं, क्यों ? झोटवाड़ा में तो एक मंदिर के कारण पूरे दिन जाम की स्थिति रहती है।


जेडीए ने मालवीय नगर में मस्जिद के साथ यहां चार और धार्मिक स्थल भी तोड़े हैं, जिनमें दो मंदिर, एक सत्संग भवन और एक मजार शामिल है। यह भी ग़लत है, इनको हटाने से पहले भी प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस का अवसर देना चाहिए था। इससे पहले 22 म‌ई 2026 को जेडीए ने यहां सड़क चौड़ीकरण के लिए 122 मकानों को भी तोड़ा था।


जमीन दो प्रकार की होती है, एक खरीदी हुई और एक गैर कानूनी कब्जे वाली। जिस भी व्यक्ति या संस्था ने कोई जमीन खरीदी है, तो उसे जेडीए अतिक्रमण कैसे बता सकता है ? अगर जमीन गैर कानूनी कब्जे की है तो जेडीए उसे जरूर अतिक्रमण की बता सकता है। यह मस्जिद जो खरीदी हुई भूमि में तब बनी थी, जब जेडीए ही नहीं बना था। अगर मस्जिद गैर कानूनी तरीके से अतिक्रमण करके बनाई गई थी, तो जेडीए या नगर निगम ने इसे 45 साल में हटाया क्यों नहीं ? अगर मस्जिद अतिक्रमण करके बनाई थी, तो फिर 29 जून 1994 को जेडीए ने 9971 रूपए इस भूखंड के नियमन हेतु जमा क्यों किए थे ?


मस्जिद कमेटी के लोग यह मांग कर रहे थे कि मस्जिद के लिए या तो आस-पास जमीन दे दी जाए या फिर सड़क 60 फीट कर ली जाए और 15-20 फीट जमीन मस्जिद के लिए छोड़ दी जाए, तो क्या जेडीए इस मांग को नहीं मान सकता था ? क्योंकि इस इलाके में कोई दूसरी मस्जिद नहीं है, तो यहां आबाद मुसलमानों के धार्मिक कार्य (नमाज़ पढ़ने) जिसका अधिकार उन्हें भारतीय संविधान ने दिया है, उसे छीनने का अधिकार जेडीए को किसने दिया ?


इस पूरे प्रकरण में मस्जिद कमेटी और जयपुर की अवाम का सराहनीय योगदान रहा, जिन्होंने इस प्रकरण पर शान्ति बनाए रखी और जयपुर का माहौल खराब नहीं होने दिया। मस्जिद कमेटी ने जो जवाब जेडीए को दिया, उसमें कानून का सम्मान करते हुए यह मांग की गई है कि सड़क चौड़ी करने हेतु हम स्वयं मस्जिद हटाने के लिए तैयार हैं, बशर्ते हमें आस-पास नमाज़ के लिए कोई जगह दे दी जाए, क्योंकि हमारे पास इस मस्जिद के अलावा नमाज़ के लिए कोई जगह नहीं है।


इस प्रकरण में मस्जिद के एक पड़ोसी ने सोशल मीडिया पर एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा कि वक्फ बोर्ड को जेडीए 81 नोटिस दे चुका है, लेकिन वक्फ बोर्ड ने कोई रिप्लाई नहीं दिया। हालांकि जांच पड़ताल की गई तो इस बात में कोई ज्यादा दम नजर नहीं आया। लेकिन यह सत्य है कि वक्फ बोर्ड को इस पूरे प्रकरण की बहुत पहले से जानकारी थी और वक्फ बोर्ड ने इस प्रकरण में कोई विशेष कोशिश नहीं की कि यह मस्जिद बचे।


यह राजस्थान वक्फ बोर्ड की घोर लापरवाही रही या मिलीभगत, जिसका जवाब वक्फ बोर्ड चेयरमैन, सीईओ और मेम्बर्स को कटघरे में खड़ा कर रहा है। जब 22 म‌ई को इस सड़क चौड़ीकरण में जेडीए ने 122 मकान तोड़े और इन मस्जिद सहित इन पांच धार्मिक स्थलों को छोड़ दिया था, तभी वक्फ बोर्ड को इस प्रकरण में अपनी आपात बैठक बुलाकर हाईकोर्ट चले जाना चाहिए था, लेकिन सवाल है वक्फ बोर्ड ने ऐसा क्यों नहीं किया ? यह लापरवाही रही या मिलीभगत ? जांच का विषय है।


राजस्थान वक्फ बोर्ड में चेयरमैन खानू बुधवाली के अलावा छह और मेम्बर हैं, जिनमें मुख्य सचेतक व आदर्श नगर विधायक रफीक खान, एडवोकेट सय्यद शाहिद हसन, यूसुफ खान, शब्बीर शेख और दो महिलाएं हैं। क्या इन सबकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि इस मुद्दे पर बोर्ड की आपात बैठक बुलाते ? क्या सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती थी, जो बोर्ड से मोटी तनख्वाह लेता है ? कानूनी तौर पर यह सभी लोग वक्फ जायदाद के रखवाले और संरक्षक हैं, फिर यह लापरवाही क्यों बरती ? 


वक्फ बोर्ड हर साल अपने वकीलों को मोटा मेहनताना देता है, फिर वक्फ बोर्ड हाईकोर्ट क्यों नहीं गया और इस मस्जिद को बचाने का प्रयास क्यों नहीं किया ? क्या वक्फ बोर्ड चेयरमैन, सीईओ और मेम्बर्स की कोई निजी सम्पत्ति होती और उसे जेडीए तोड़ने आता, तो ऐसे ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते ? मान लिया कि शनिवार और रविवार की छुट्टी थी, तो क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि छुट्टी के दिन दो-चार सीनियर एडवोकेट चीफ जस्टिस राजस्थान हाईकोर्ट के बंगले पर पेश होकर न्याय की गुहार लगाते ?



बड़ी विचित्र बात यह भी है कि जिस दिन 5 जून की रात को जेडीए ने मस्जिद हटाने का नोटिस दिया, उस दिन यूनुस खां को छोड़कर सभी चारों मुस्लिम विधायक (रफीक खान, अमीन कागजी, जाकिर गैसावत व हाकम अली खां) और वक्फ बोर्ड चेयरमैन खानू खां बुधवाली वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन सलावत खां के यहां एक पार्टी कर रहे थे और इस पार्टी के बाद इन्होंने एक कार्यक्रम का पोस्टर विमोचित किया। अगले दिन यानी 6 जून को खानू खां उसी पोस्टर का विमोचन करने के लिए चूरू चले गए। इसी दिन पूर्व मंत्री व डीडवाना विधायक यूनुस खां भी एक कार्यक्रम करने चूरू आए हुए थे, जबकि इन सभी विधायकों और वक्फ बोर्ड चेयरमैन को 6 जून को मुख्यमंत्री से मिलना चाहिए था और मस्जिद को बचाने का प्रयास करना चाहिए था।


इस प्रकरण में बहुत ही अफसोसनाक रवैया पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और पूर्व पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट का रहा। जिन्होंने इस प्रकरण पर अपना मुंह भी नहीं खोला। जबकि कांग्रेस के यह नेता आए दिन लोकतंत्र बचाने और संविधान बचाने की दुहाई देते रहते हैं। क्या ऐसे ही लोकतंत्र और संविधान बच जाएगा ?


जेडीए द्वारा सिर्फ सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद ढहाई ग‌ई या इसके पीछे कुछ और कारण है ? देश में जग जाहिर है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति चल रही है। जनता रोटी रोजगार, बढती महंगाई और पेपर लीक से परेशान है, क्या जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटाने के लिए तो सत्ताधीशों ने आनन फानन में यह काम नहीं करवाया है ?

(09/06/2026)

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-@-फारूक़ अली ख़ान सम्पादक

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